-अपेक्स बैंक ने जारी किए जिला सहकारी बैंकों को आदेश
-होनी थी साढ़े तीन हजार करोड़ की उगाही
भोपाल।
प्राकृतिक आपदा से फसल बरबादी की पीड़ा झेल रहे नत्थाओं (किसानों) से अब वसूली नहीं होगी। अपेक्स बैंक ने प्रदेश की सभी जिला सहकारी बैंकों को आदेश जारी किए हैं। दरअसल, समितियों ने रबी फसल के लिए प्रदेश के साढ़े चार हजार से अधिक किसानों को साढ़े तीन हजार करोड़ का कर्ज दिया है।
किसानों से फसल विक्रय के बाद 15 जून तक यह वसूली समितियों को करनी है। केंद्रीय बैंकों को फरमान जारी होने बाद से प्रदेश में वसूली पर रोक लगा दी गई है। जानकारी के अनुसार प्रदेश सरकार ने किसानों से वसूली रोकने की अनुशंसा की थी। उल्लेखनीय है कि मार्च से मई माह तक समितियां कर्ज अदायगी के लिए किसानों पर दबाव बनाती है। अपेक्स बैंक ने अपने आदेश में किसानों की फसलों पर ओला-पाला की मार का हवाला दिया है। साथ ही कहा है, गेहूं बेचने के बाद यदि किसान अपनी मर्जी से कर्ज अदायगी करना चाहे तो उसे लिया जाए। बैंक सूत्रों की माने तो इस कदम से वसूली प्रभावित होगी। वहीं इसका भार आने वाले साल में बढ़ेगा।
किसानों की लें सहमति
अपेक्स बैंक ने निर्देशों में कर्ज अदायगी के लिए किसानों की सहमति लेना जरूरी कर दिया है। उल्लेखनीय है कि गेहूं विक्रय के बाद गेहूं की रकम का भुगतान किसान के सहकारी बैंकों के खाते में किया जाता है। इस कारण से समिति पदाधिकारियों को पता रहता है कि किसानों के खातों में कितनी रकम है। इसी आधार पर कर्ज वसूली के लिए किसानों पर दबाव बनाया जाता है। इसके चलते किसान राशि भुगतान भी करते हैं। इस बार ऐसे करने पर सख्ती बरती गई है। वहीं सरकार ने भी ओला प्रभावित किसानों से कर्ज वसूली स्थगित कर दी गई है।
अचानक रणनीति में बदलाव
किसानों से कर्ज वसूली का इस साल भी टारगेट रखा गया था। ऐसे में बैंकों की वसूली प्रभावित होने के आसार सौ फीसदी बढ़ गए हैं। सूत्रों की माने तो हर गेहूं उपार्जन केंद्र पर किसान से की जाने वाली वसूली का पूरा रिकार्ड अपडेट किया गया है। इसे ई-उपार्जन साफ्टवेयर में किसान की पूरी कुंडली फीड की गई है। मकसद साफ था, वसूली को बढ़ावा देना । इस बार मौसम की मार और चुनावी साल को देखते हुए रणनीति में बदलाव किया गया है। अचानक हुए इस बदलाव से बैंकों का हिसाब-किताब गड़बड़ा जाएगा। बैंक सूत्रों के अनुसार ओला प्रभावित किसानों का सर्वे अभी तक पूरा नहीं हो पाया है। इसके कारण न तो कर्ज को अल्पावधि से मध्यावधि में बदला जा सका है और न ही नाबार्ड को कोई जानकारी भेजी गई है। बताया जा रहा है कि अभी तक 27-28 जिलों की ही रिपोर्ट आई है। वहीं सहकारिता विभाग ने ने भी अब तक शासन से अनुदान की कोई मांग नहीं की है।
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