देश के लिए शहीद हुए बेटे कैप्टन देवाशीष शर्मा की याद में उनकी मां निर्मला शर्मा हर साल की तरह इस बार भी यहां मिट्टी से बनी कलाकृतियों की प्रदर्शनी लगाएंगीं। श्रीमती शर्मा ने बताया, इस बार प्रदर्शनी में बर्तन, प्याले, मग और बॉस्केट समेत लगभग 70 वस्तुएं प्रदर्शनी में रखेंगी। ये प्रदर्शनी सशस्त्र सेना झंडा दिवस के मौके पर जिला सैनिक कल्याण बोर्ड परिसर में लगेगी।
शनिवार से शुरू होने वाली प्रदर्शनी को आकार सुकुमार नाम दिया गया है। प्रदर्शनी में इन वस्तुओं की बिक्री से होने पर इससे मिलने वाले धन को झंडा दिवस कोष में जमा किया जाएगा। यह प्रदर्शनी 11 दिसंबर तक चलेगी। अपने इकलौते बेटे की शहादत के बाद पति जितेंद्र कुमार शर्मा को भी खोने का दर्द उनके चेहरे पर पढ़ा जा सकता है। जीवन के तमाम उतार चढ़ाव देख चुकीं श्रीमती शर्मा वर्षों से मिट्टी के बर्तनों और कलाकृतियों का निर्माण करती आ रही हैं। पति और पुत्र को खोने के बाद कलाकृतियों को जीवन का मकसद बना लिया है। कैप्टन देवाशीष शर्मा सेना की मेडिकल कोर में अधिकारी के तौरपर वर्ष 1994 में कश्मीर घाटी में तैनात थे। पंजाब रेजीमेंट की छव्बीसवीं बटालियन में तैनाती के वकत कैप्टन शर्मा दस दिसंबर को डंगरपुर गांव में आतंकवादियों का मुकाबला करते वकत शहीद हो गए थे। सेना के एक गश्ती दल पर हमले के बाद घायल जवानों के इलाज के लिए कैप्टन शर्मा पहुंचे थे।
लेकिन वे स्वयं भी घायल हो गए। अपनी परवाह किए बगैर कैप्टन शर्मा ने न सिर्फ अपने साथी जवानोंका इलाज किया बल्कि स्वयं भी बंदूक थामकर शत्रुओं का मुकाबला किया। कैप्टन शर्मा को मरणोपरांत ..कीर्ति चक्र.. से नवाजा गया। जम्मू-कश्मीर सरकार ने उन्हें सैन्य सेवा पदक प्रदान किया।
सेना अध्यक्ष ने इस अधिकारी को प्रशस्ति पत्र प्रदान किया था। केंद्रीय विद्यालयों में अथर्शास्त्र की शिक्षिका रह चुकी श्रीमती शर्मा के यहां स्थित निवास पर सेरेमिक कलाकृतियों के निर्माण के लिए एक वर्कशाप भी है। पति की स्मृति में श्रीमती शर्मा ने उनकी अनेक कविताओं को बर्तनों पर उकेरा है। श्री शर्मा भी होशंगाबाद के केंद्रीय विद्यालय से प्राचार्य के रूप मे ंसेवानिवृत हुए थे। श्री शर्मा ने अपने पुत्र के साथ बचपन में बिताए पलों को अपनी कविताओं ..छोट सा हाथ.. और ..फूलों की घाटी.. में दर्ज किया है।
शनिवार से शुरू होने वाली प्रदर्शनी को आकार सुकुमार नाम दिया गया है। प्रदर्शनी में इन वस्तुओं की बिक्री से होने पर इससे मिलने वाले धन को झंडा दिवस कोष में जमा किया जाएगा। यह प्रदर्शनी 11 दिसंबर तक चलेगी। अपने इकलौते बेटे की शहादत के बाद पति जितेंद्र कुमार शर्मा को भी खोने का दर्द उनके चेहरे पर पढ़ा जा सकता है। जीवन के तमाम उतार चढ़ाव देख चुकीं श्रीमती शर्मा वर्षों से मिट्टी के बर्तनों और कलाकृतियों का निर्माण करती आ रही हैं। पति और पुत्र को खोने के बाद कलाकृतियों को जीवन का मकसद बना लिया है। कैप्टन देवाशीष शर्मा सेना की मेडिकल कोर में अधिकारी के तौरपर वर्ष 1994 में कश्मीर घाटी में तैनात थे। पंजाब रेजीमेंट की छव्बीसवीं बटालियन में तैनाती के वकत कैप्टन शर्मा दस दिसंबर को डंगरपुर गांव में आतंकवादियों का मुकाबला करते वकत शहीद हो गए थे। सेना के एक गश्ती दल पर हमले के बाद घायल जवानों के इलाज के लिए कैप्टन शर्मा पहुंचे थे।
लेकिन वे स्वयं भी घायल हो गए। अपनी परवाह किए बगैर कैप्टन शर्मा ने न सिर्फ अपने साथी जवानोंका इलाज किया बल्कि स्वयं भी बंदूक थामकर शत्रुओं का मुकाबला किया। कैप्टन शर्मा को मरणोपरांत ..कीर्ति चक्र.. से नवाजा गया। जम्मू-कश्मीर सरकार ने उन्हें सैन्य सेवा पदक प्रदान किया।
सेना अध्यक्ष ने इस अधिकारी को प्रशस्ति पत्र प्रदान किया था। केंद्रीय विद्यालयों में अथर्शास्त्र की शिक्षिका रह चुकी श्रीमती शर्मा के यहां स्थित निवास पर सेरेमिक कलाकृतियों के निर्माण के लिए एक वर्कशाप भी है। पति की स्मृति में श्रीमती शर्मा ने उनकी अनेक कविताओं को बर्तनों पर उकेरा है। श्री शर्मा भी होशंगाबाद के केंद्रीय विद्यालय से प्राचार्य के रूप मे ंसेवानिवृत हुए थे। श्री शर्मा ने अपने पुत्र के साथ बचपन में बिताए पलों को अपनी कविताओं ..छोट सा हाथ.. और ..फूलों की घाटी.. में दर्ज किया है।
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