बुधवार, 5 जून 2013

'शाहपुरा झील नाले में तब्दील'

-पर्यावरण विषय पर काम करने वाली संस्था जीसीड ने लगाए आरोप 
भोपाल। 
राजधानी की खूबसूरती में चार चांद लगाने वाली शाहपुरा झील पूरी तरह नाले में तब्दील हो चुकी है। चौकाने वाली बात यह है सरकार इसे झील बता इसके लिए करोड़ों रुपए ले रही है। यह आरोप पर्यावरण क्षेत्र में काम करने वाली संस्था जीसीड ने लगाए। 
जीसीड के के अध्यक्ष सुभाष सी.पाण्डेय ने पत्रकारों से चर्चा में बताया, अब यहां संड़ान्ध मारते पानी में जीव-जंतु भी नहीं पनप रहे हैं। सरकारी महकमों की लापरवाही के कारण अब राजधानी की झीलें सीवेज 'सीवेज पौंडÓ में तब्दील होती जा रहीं हैं। लगभग 73 हैक्टेयर झील का जलक्षेत्र है। यह झील का क्षेझ अब बजबजाते एक गंदे पोखर में तब्दील हो गया है। अब यह झील गटर टैंक की शक्ल ले चुका है। झील में भोपाल के चौथाई हिस्सा आबादी क्षेत्र से बहकर आने वाला मल-मूत्र, जैविक-अजैविक ठोस कचरा, खतरनाक रसायन और नालों से बहकर आने वाली तमाम गंदगी एकत्र होती है। इसके चलते आसपास के तमाम रिहायशी इलाकों-शाहपुरा, चूनाभ_ी, कोलार रोड में रहने वाले लाखों लोगों का स्वास्थ्य खतरे में पड़ रहा है। श्री पांडे ने कहा, पानी जलीय जीवन के लिए भी सुरक्षित नहीं बचा है। इसमें डेल, टिन सहित अन्य हैवी मेटल्स मिल रहे हैं। सरकारी नुमांदों और सरकार ने इस झील को संरक्षण के लिए किसी प्रकार के कोई कदम अब तक नहीं उठाए हैं। 

-शुद्धिकरण के नाम पर खा रहे राशि 
पर्यावरणविद पाण्डेय ने कहा, शाहपुरा झील के शुद्धिकरण के नाम पर कई मदो से सरकार को लाखों रुपए में राशि मिल रही है। राज्य शासन के आला अफसर ही इसमें बड़ी भूमिका निभा रहें हैं। श्री पांडे ने कहो, एप्को ने चार इमली नाले को शुद्ध करने के लिए ईको बायोटेक्नीक के नाम पर 14.10 लाख रुपए झटक लिए और नतीजा सिफर रहा। इसी तरह सीपीए और मप्र टूरिज्म ने शाहपुरा गटर के पानी को शुद्ध करने की बजाए उसका सौंदर्यीकरण कर डाला। गौर करने वाली बात यह है इसी झील से सटा मप्र का पर्यावरण परिसर है। इसमें प्रदूषण नियंत्रण मंडल, एप्को, टाउन एंड कंट्री प्लानिंग तथा आपदा प्रबंधन संस्थान हैं। इनकी बड़ी जिम्मेदारी होती है शहरी विकास में बारीकी से ध्यान देने की पर इन्हीं संस्थानों का गंदा पानी झील में मिल रहा है। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें