बुधवार, 5 जून 2013

केवल दिखावे की रह गई विभागीय जनसुनवाई

-किसे दें आवेदन, दफ्तर में बैठते ही नहीं आला अफसर 
-1203 आवेदन आ चुके हैं अब तक 
भोपाल। 
राजधानी में विभागीय जनसुनवाई केवल दिखावे की रह गई है। लोग आवेदन तो विभागों की जनसुनवाई में लेकर पहुंच रहे हैं, लेकिन अधिकारियों के न होने से लौकर चल देते हैं। अब तक १२०३ शिकायती आवेदन लोग दे चुके हैं। 
इतने आवेदनों में 565 आवेदन तो वह हैं, जो प्रत्यक्ष रूप से विभाग लटके होना बता रही हैं। ऐसे ही कुछ और प्रकरण भी निराकरण के लिए पड़े हुए, जिन्हें केवल नाम के लिए निराकृत दर्शाया जा रहा है। विभागीय जिला अधिकारियों की लापरवाही का नतीजे के चलते आवेदकों की संख्या कलेक्टर में बढ़ रही है। कलेक्टर की जनसुनवाई में १०० से अधिक आवेदन पहुंच रहे हैं। वहीं विभागीय जनसुनवाई में २५ से अधिक शिकायतें नहीं हो पाती। विभागों में बाबू आवेदन रिसीव करते और जांच के लिए आगे रवाना कर देते हैं। ऐसे में विभागों श्रमायुक्त कार्यालय, डीआर, हुजूर और गोविन्दपुरा वृत्त शामिल हैं। 

-565 लंबित आवेदन 
अक्टूबर 2011 में विभागीय जनसुनवाई की शुरू की गई थी। इसे शुरू करने के पीछे मुख्य उद्देश्य कलेक्टर की जनसुनवाई में आने वाले आवेदनों की संख्या कम करने के साथ सीधे संबंधित अधिकारी से आवेदक को रूबरू करना था। अधिकारियों के विभागों में न बैठने का नतीजा यह रहा कि अब आवेदक इन जनसुनवाई में पहुंचते ही नहीं। फिलहाल अधीनस्थ कर्मचारी इस काम को देख रहे हैं। एक जानकारी के अनुसार अब तक 1203 शिकायती आवेदन इस तरह मिले हैं। इनमें से 638 की निराकृत हो सके हैं। वहीं 565 आवेदन निराकरण के लिए लंबित हैं। साथ ही 532 के करीब आवेदन डिफाल्टर सूची के हैं। विभागीय लोगों की मानें तो आला अफसरों को इन आवेदनों से सीधे तौर पर कोई लेना देना ही नहीं होता। वह इसे सामान्य प्रक्रिया समझते हैं और आवेदन को टाल देते हैं। 

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