गुरुवार, 12 सितंबर 2013

हिन्दी: जनसंवाद का संचार सेतु

संविधान में किसी भाषा का उल्लेख भारत की राष्ट्रभाषा या राष्ट्रीयभाषा के रूप में नहीं किया गया है।  राज्यों की अपनी राजभाषाएं हैं। ‘राष्ट्रीय भाषाएं’ जैसे पद-प्रत्यय का जिक्र कहीं भी नहीं किया गया है। श्रीयुत हरिबाबू कंसल ने राष्ट्रभाषा और राजभाषा के बीच विभेद का निराकरण इस प्रकार किया है: ‘‘संविधान में राष्ट्रीय शब्द का प्रयोग कहीं नहीं किया गया है। संविधान के भाग -17  का शीर्षक है ‘राजभाषा’  इसका अध्याय-1 संघ की भाषा के विषय में है। इसके अनुच्छेद 343 में संघ की राजभाषा का उल्लेख है। और अनुच्छेद 344 राजभाषा के संबंध में आयोग और संसद की समिति के बारे में है। अध्याय 2 का शीर्षक है ‘प्रादेषिक भाषा या राजभाषाएं’ संबंधी  है। अनुच्छेद 346 एक राज्य और दूसरे राज्य के बीच या किसी राज्य और संघ के बीच पत्रादि की राजभाषा विषयक है। अनुच्छेद 351 में हिन्दी के राष्ट्रभाषा की कल्पना मात्र ही की गई है। राजभाषा आयोग की सिफारिष पर जो वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग बना, उसने शब्दावली इस प्रकार तैयार की है कि वह केवल हिन्दी भाषा के लिए ही काम न आये। उसका प्रयोग समान्यतः अन्य भाषा में भी हो सके।’’

इस तरह संविधानानुसार भारत राष्ट्र की कोई अधिकारिक राष्ट्रभाषा नहीं है। असल में भारत छोड़ो आंदोलन (1942) के प्रारंभिक  वर्ष में महात्मा गांधी की प्रेरणा से हिन्दुस्तानी प्रचार सभा की स्थापना हुई थी जिसका लक्ष्य ऐसी भाषा के प्रयोग को बढ़ावा देना था जो  अरबी, फारसी व संस्कृत के जटिल शब्दों से बोझिल न हो और जिसे आम हिन्दुस्तानी सहजता से प्रयोग में लाते हो।  1946  में संविधान सभा का गठन हुआ था तब राजभाषा का प्रष्न उठा। इस दौरान सभी ने हिंदी  भाषा का प्रबल समर्थन किया। तब 14 सितंबर 1949  को संविधान सभा में देवनागरी लिपि में लिखित हिंदी को राजभाषा स्वीकार किया गया। इसी कारण 14 सितंबर को ‘हिन्दी दिवस’ मनाया जाता है। 

प्रष्न यह है कि जब किसी  भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा ही नहीं हो तो क्यों हिन्दी भाषा को लेकर इतनी हाय-तौबा मचाई जाती है। अब इसके निम्न कारण माने जा सकते हैं: हिन्दी भाषा की वृहद वर्ग तक पहुँच। बोलने तथा समझने में उपयुक्त। विषाल शब्द भंडार और व्याकरणीय रूप से सुव्यवस्थित भाषा। 

इस सभी रूपों में भारतीय भौगोलिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण के अनुसार हिन्दी एक जनभाषा है जो समूचे भारत में व्यापक वर्ग में बोली जाती है। हिन्दुस्तान ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में हिन्दी भाषी लोगों की संख्या सर्वाधिक है। किसी वर्ग विशेष में किसी विषय विशेष पर चेतना का संचार तभी किया जा सकता है जब उसे उसकी मातृभाषा  में वह समझाया जाये।  भारत में वह भाषा हिन्दी ही है जिसकी पहुँच जन-जन तक है। आकड़ों पर गौर करें तो देष की जनसंख्या की 50 प्रतिशत से अधिक आबादी हिन्दी भाषा बोल और समझ सकती है। जबकि दुनिया भर में 50 करोड़ से अधिक लोग हिन्दी बोल सकते हैं तथा समझने वालों  की संख्या करीब 80 करोड़ है। यह हिन्दी  भाषा की सरलता का ही कमाल है कि भारत के अलावा 22 अन्य देषों में हिन्दी बोली और समझी जाती है। भारत के बाहर 165 विष्वविद्यालयों में हिन्दी अध्ययन और 
अध्यापन  की व्यवस्था है। 10 लाख लोग दक्षिण अफ्रीका में हिन्दी बोलते हैं जिनकी संख्या एषिया उपमहाद्वीप के बाहर किसी भी देष में सबसे ज्यादा है यहां तक ग्रेट ब्रिटेन में हिन्दी बोलने वालों की संख्या 2.5 लाख से अधिक है। 

यह सभी आकड़े विदेषों में हिन्दी  के गौरव  और वहां के लोगों  द्वारा हिन्दी को दिये जा रहे सम्मान को दर्षाते  हैं लेकिन हमारे ही देष में हिन्दी की जो दुर्दषा की जा रही है वह हमारी असंवेदनषीलता, उदासीनता और तीखे स्वरों में कहे तो हिकारत को बता रही है। क्यों हम अपनी ही मातृभाषा को  वो सम्मान नहीं दे पा रहे हैं? जो उसे  बाहर मिल रहा है। क्यों हम विदेषी भाषा के प्रभाव में आकर अपनी उस भाषा को रौंदने में लगे है। जो देष के व्यापक वर्ग को जोड़े रखने का सेतु है।

सभी को यह जानकर आष्चर्य होगा कि हिन्दी भाषा का पहला व्याकरण डच विद्वान केटलाग ने सृजित हुआ। हिन्दी साहित्य का पहला इतिहास फ्रांसीसी विद्वान गार्सा द तासी द्वारा लिखा गया था। हिन्दी और भारतीय भाषाओं का पहला व्यापक सर्वेक्षण अंग्रेजी विद्वान सर जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने किया था। हिंदी पर लिखा गया पहला शोध ‘द थियोलॉजी ऑफ तुलसीदास’ अंग्रेज विद्वान जे आर. कारर्षेटर के द्वारा लंदन विष्वविद्यालय में डी.लिट. की उपाधि के लिए प्रस्तुत किया गया था। विधिवत हिन्दी की प्रारंभिक पाठ्य पुस्तकें  जॉन-बोथविक गिलक्रिस्ट ने तैयार की थीं। विदेषी भाषाओं के हिन्दी द्विभाषी कोश भी सर्वप्रथम विदेषी विद्वान द्वारा ही बनाये गये थे। 

आज भी विदेषों में कई विदेषी विद्वान हिन्दी की सेवा में तन-मन से लगे हुये हैं। लेकिन हम अपनी अकर्मण्यता से अपनी ही भाषा, संस्कृति का लोप करने में लगे हुये हैं। हमें यह समझना होगा कि कोई भी देष अपनी मातृभाषा को त्याग कर विकास की सीढ़ियां नहीं चढ़ पाया है। इस मामले में जापान, चीन जैसे देष मिसाल हैं जिन्होंने बिना बाहरी देषों के प्रभाव में आते हुए न सिर्फ अपनी मातृभाषा को पूरा सम्मान देते हुए विकास के नये आयामों को छुआ है। ऐसी ही जबावदारी हमारी और सरकार की भी है कि वह हिन्दी के विकास में पुरजोर भूमिका निभाये और अपने कार्यों को हिन्दी में करते हुए जन-जन तक अपना संदेष पहुँचाये। 

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