-राजपाल पहनना चाहता था वर्दी, उसकी मौत छोड़ गई कई सवाल
-अब भी कई हितग्राहियों का हो रहा शोषण
भोपाल।
पुलिस की नौकरी पाने के लिए तैयारी कर रहे राजपाल का जाति प्रमाण-पत्र न बन पाना, विभागीय नियमों पर तो सवाल उठा ही रहा है, साथ ही जिला प्रशासन के अधिकारी-कमर्चारियों की लापरवाही की पोल भी खोल रहा है। शुक्रवार सुबह हुई राजपाल की मौत ने ऐसे कई सवाल खड़े कर दिए हैं, जो बयां करते हैं कि जाति प्रमाण पत्र बनवाना किसी जंग से कम नहीं है। सवाल यह भी उठता है कि विभागीय लापरवाही और अधिकारी-कमर्चारियों की मनमानी अभी और कितनों की जांच लेगी? मात्र जाति प्रमाण पत्र जैसे छोटे से काम के बदले गई एक जान ने समूची प्रशासनिक व्यवस्था को सवालों में कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है।
हालांकि इसके उलट भी स्थिति देखने में सामने आ रही है, जो व्यक्ति जिस जिले या राज्य का निवासी है, वहां से प्रमाणपत्र बनवाने के बजाय राजधानी में जुगाड़ लगाने क्यों जुट जाता है? वतर्मान में शहर में ऐसे सैकड़ों लोग हैं, जो मूलत: उत्तरप्रदेश, बिहार, राजस्थान, छत्तीसगढ़ व महाराष्ट्र के निवासी हैं, लेकिन उन्होंने किसी न किसी तरह जुगाड़ ने अपना जाति प्रमाण पत्र बनवा लिया है। राज एक्सप्रेस ने जब जाति प्रमाण पत्र बनाने की प्रक्रिया से लेकर नियमों के संबंध में जांच पड़ताल की तो यह समाने आई हकीकत -
300 से अधिक आवेदन छह माह से पड़े हैं पेंडिंग - जाति प्रमाण पत्र बनाने की समयसीमा सामान्य प्रशासन विभाग के सर्कुलर में छह माह से घटाकर तीन माह कर दी गई है। यहीं नहीं समाधान केंद्र में आने वाले जाति के आवेदनों का निराकरण तो एक माह में भीतर करके देना होता है। बावजूद इसके यह प्रमाण पत्र तीन माह तो छोड़िए, छह माह तक में भी नहीं बन पा रहे हैं। वतर्मान में जाति प्रमाण पत्र बनने के करीब 300 से अधिक ऐसे हैं, जिन्हें छह माह से अधिक समय बीत चुका है। जबकि तीन माह की लिमिट निकलने वाले आवेदनों की सं या भी इससे कम नहीं है। यह हम नहीं बल्कि प्रशासन स्वयं कह रहा है। प्रशासन की माने तो कलेक्टर कार्यालय स्थिति समाधान केंद्र में प्रतिदिन करीब 50 से 60 जाति प्रमाण पत्र के आवेदन आते हैं। इस तरह एक माह में करीब 1000 से 1100 आवेदन आते हैं,इनमें से कुछ आवेदन निर्धारित समय में निरस्त हो जाते हैं और कुल लंबित रह जाते हैं। हालांकि समाधान केंद्र द्वारा सभी आवेदनों के निराकरण की समयसीमा एक माह तय की जाती है। वतर्मान में भी करीब 2000 आवेदन लंबित पड़े हुए हैं, जिनके बनने की प्रोसेस चल रही है।
नहीं पहुंचता सही सर्किल में - देखने में आ रहा है कि जाति प्रमाण पत्र संबंधी जो भी आवेदन आते हैं वह सही सर्किल में नहीं पहुंच पाते हैं। जिसके चलते वह महीनों पेंडिंग पड़ा रहता है। राजस्व निरीक्षक व पटवारी जब जांच के लिए आवेदन पर ध्यान देता है तब उसे पता चलता है कि यह उसके सर्किल का नहीं है तो आवेदन सीधा तहसीलदार के पास पुन: भिजवा दिया जाता है। इसके बाद फिर से वह दूसरे सर्किल में जाती है। इधर देखने में आया है कि पटवारी-आरआई को भी बहुत काम दे रखे हैं, जिसके चलते मौके पर जाकर पंचनामा बना पाना या जांच पड़ताल कर पाना संभव नहीं है। जांच रिपोर्ट तैयार होने में इसलिए महीना लग रहा है।
- यहां फंसता है पेंच -
- आवेदनकर्ता यदि अजा व अजजा का है और वह सन 1950 का रिकार्ड नहीं लगाता है, तो उसका आवेदन निरस्त हो जाता है।
- आवेदन में ही पूरे दस्तावेज के बारे में जानकारी होती है, इसके बावजूद भी दस्तोवज नहीं लगाए जाते हैं, बाद में दिक्कत पैदा होती है।
- जो मूलत: भोपाल के निवासी नहीं है, वह भी जाति प्रमाण पत्र के लिए आवेदन करते हैं और उन्हें बनाने के लिए दलालों का सहारा लेते हैं।
- 50 साल के रिकार्ड को संभालकर रख पाना भी डेढ़ी खीर है। जिसके पास रिकार्ड नहीं होता उन्हें भटकना पड़ता है।
- राजधानी में धोबी जाति को एससी में रखा गया है, जबकि अन्य जिलों में वह ओबीसी में आते हैं। इसका नियम का फायदा लेने के लिए बहुत सारे लोग जो विभिन्न जिलों में रहते हैं और भोपाल में पढ़ाई या अन्य उद्देश्य के जमे हुए हैं, वह किसी न किसी तरह जाति प्रमाण पत्र बनवाने के लिए जुटे रहते हैं।
-यह है प्रक्रिया -
जाति प्रमाण पत्र बनवाने के लिए सभी दस्तावेजों के साथ आवेदन कलेक्टर कार्यालय में स्थापित समाधान केंद्र या तहसील कार्यालय में जमा किया जा सकता है। समाधान केंद्र में जमा होने वाले आवेदन के लिए 50 रुपए की रसीद कटती है। आवेदन पहले तहसीलदार के पास जाता है। जहां से उसे संबंधित क्षेत्र के आरआई-पटवारी के पास भेजा जाता है, जहां का आवेदन में पता लिखा होता है। आरआई-पटवारी मौका मुआयना व जाति की पुष्टि कर अपनी रिपोर्ट बनाकर तहसीलदार को प्रकरण बनाकर भेजता है और यही प्रकरण तहसीलदार की रिपोर्ट के साथ एसडीएम के पास पहुंचता है। यदि आवेदन के साथ किसी दस्तावेज की कमी होती है तो एसडीएम उसे मंगवाता है, यदि वह दस्तावेज नहीं होते हैं या फिर रिपोर्ट में व्यक्ति के जिले से बाहर के रहने की पुष्टि होती है, तो आवेदन को निरस्त कर दिया जाता है अन्यथा आवेदन को एसडीएम द्वारा स्वीकृत कर जाति प्रमाण पत्र बना दिया जाता है।
इन दस्तावेजों की होती है जरूरत
- आवेदन फार्म का भरा होना व उनमें पीछे लगा हुआ शपथ पत्र का नोटराईज्ड होना।
- आवेदन करने वाले के दो फोटो
- समाज का प्रमाण पत्र
- पिछड़ा वर्ग है तो सन् 1984 का रिकार्ड, अजा व अजजा है तो 1950 का रिकार्ड
- फोटो परिचय पत्र व राशनकार्ड की छायाप्रति या पते संबंधी कोई अन्य दस्तावेज
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नोट - इसके अतिरिक्त उसके पास अन्य कोई दस्तोवज है तो वह भी जमा किए जा सकते हैं। नहीं तो इतने दस्तावेजों के आधार पर भी प्रमाणपत्र बन जाता है।
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-इस नियम का नहीं होता पालन
यदि कोई व्यक्ति जिले से बाहर का है और उसकी पुष्टि हो जाती है, तो आवेदन निरस्त कर दिया जाता है, जबकि होना यह चाहिए कि उस आवेदन को उस जिले को फारवर्ड कर देना चाहिए ताकि वहां से जाति संबंधी जांच पड़ताल हो सके। जैसे ही उसकी पुष्टि होती है, उसके रिकार्ड के आधार पर संबंधित क्षेत्र का जाति प्रमाण पत्र भोपाल जिले से जारी हो जाना चाहिए।
-अपील का भी है प्रावधान
जाति प्रमाण पत्र आवेदन निरस्त हो जाने के बाद अपील का प्रावधान है। इसके बावजूद भी लोग इस नियम का लाभ नहीं उठाते हैं।
-नहीं बनवाते प्रारूप तीन के तहत प्रमाण-पत्र
विभागीय अधिकारियों की माने तो यदि कोई व्यक्ति जो मप्र राज्य की सीमा से बाहर निवास करता है, उसे भी जाति प्रमाण पत्र दिया जा सकता है, लेकिन उसको यह प्रमाण पत्र प्रारूप तीन के तहत। बाहरी राज्यों से आकर भोपाल में निवास करने वाले इस प्रारूप के तहत जाति प्रमाण पत्र नहीं बनवाते हैं, क्योंकि इस प्रारूप के तहत बने प्रमाण पत्र, मप्र की सेवाओं के लिए मान्य नहीं होते हैं। इधर अधिकारी भी ऐसे केसो में प्रारूप तीन के प्रमाण पत्र जारी नहीं करते हैं और आवेदन निरस्त कर देते हैं।
-दलाल करवाते हैं फर्जी काम
सूत्रों की माने तो जिले में जो भी व्यक्ति जाति प्रमाण पत्र आता है वह या तो सीधे समाधान केंद्र में जाता है या फिर दलालों में फेर में अटक जाता है। जो सीधे जाता है उसके आवेदनों की जांच पड़ताल सही तरीके से होती है, जबकि दलालों के माध्यम से पहुंचा आवेदन मूलत: कम ही देखा जाता है। दलाल प्रमाण पत्र गलत तरीके से बनवाने के लिए लोगों से मोटी रकम ऐंठता है। यहीं नहीं इसमें से अधिकतर राशि निचले क्रम के कमर्चारियों से लेकर अधिकारियों तक पहुुंचती है, जिसके चलते फर्जी प्रमाण पत्र जारी हो जाते हैं, जबकि शहर का मूल परिवार इसी प्रमाण पत्र को पाने से इधर-उधर भटकता रहता है।
-नहीं होता सर्कुलर का पालन
जीएडी ने जाति प्रमाण पत्र को लेकर तैयार नए सर्कुलर में 1950 या 1984 के दस्तावेजों को लेकर जो बाध्य न किए जाने की बात कही गई है। उस सर्कुलर में कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति जाति प्रमाण पत्र संबंधी आवेदन में 1950 या 1984 के दस्तावेज नहीं लगा पाते हैं, उसका प्रकरण निरस्त करने के बजाय, समुचित स्थानीय जांच कर पता करनें का प्रयास करें कि वह कहां का निवासी है और यदि पुष्टि होती है कि वह 1950 या 1984 में उसी जिले का निवासी है, जहां पर आवेदन कर रहा है तो उसका जाति प्रमाण पत्र आसपास के लोगों के बयानों से तैयार किए गए पंचनामें के दस्तावेज मानकर बनाया जाना चाहिए।
-कागज जुटाने में आती है परेशानी
वतर्मान में राजधानी में ऐसे बहुत से लोग होंगे, जिनके पास 50 साल का रिकार्ड उपलब्ध नहीं है और उनके द्वारा इतने साल का रिकार्ड संभालकर रख पाना संभव भी नहीं है। कई अधिकारियों का मानना है कि 50 साल तक का रिकार्ड संभालकर रखना मुश्किल काम है। जब जाति प्रमाण पत्र के लिए यह दस्तावेज मांगे जाते हैं तो उनको जुटाना भी मुश्किल ही होता है। छत्तीसगढ़ सरकार ने वतर्मान में कैबिनेट में एक निर्णय पारित कर केवल शपथ पत्र व अन्य दस्तावेजों के आधार पर जाति प्रमाण पत्र बनाने की जो पात्रता प्रदान की है, उसे प्रदेश में भी लागू होना चाहिए।
-अब भी कई हितग्राहियों का हो रहा शोषण
भोपाल।
पुलिस की नौकरी पाने के लिए तैयारी कर रहे राजपाल का जाति प्रमाण-पत्र न बन पाना, विभागीय नियमों पर तो सवाल उठा ही रहा है, साथ ही जिला प्रशासन के अधिकारी-कमर्चारियों की लापरवाही की पोल भी खोल रहा है। शुक्रवार सुबह हुई राजपाल की मौत ने ऐसे कई सवाल खड़े कर दिए हैं, जो बयां करते हैं कि जाति प्रमाण पत्र बनवाना किसी जंग से कम नहीं है। सवाल यह भी उठता है कि विभागीय लापरवाही और अधिकारी-कमर्चारियों की मनमानी अभी और कितनों की जांच लेगी? मात्र जाति प्रमाण पत्र जैसे छोटे से काम के बदले गई एक जान ने समूची प्रशासनिक व्यवस्था को सवालों में कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है।
हालांकि इसके उलट भी स्थिति देखने में सामने आ रही है, जो व्यक्ति जिस जिले या राज्य का निवासी है, वहां से प्रमाणपत्र बनवाने के बजाय राजधानी में जुगाड़ लगाने क्यों जुट जाता है? वतर्मान में शहर में ऐसे सैकड़ों लोग हैं, जो मूलत: उत्तरप्रदेश, बिहार, राजस्थान, छत्तीसगढ़ व महाराष्ट्र के निवासी हैं, लेकिन उन्होंने किसी न किसी तरह जुगाड़ ने अपना जाति प्रमाण पत्र बनवा लिया है। राज एक्सप्रेस ने जब जाति प्रमाण पत्र बनाने की प्रक्रिया से लेकर नियमों के संबंध में जांच पड़ताल की तो यह समाने आई हकीकत -
300 से अधिक आवेदन छह माह से पड़े हैं पेंडिंग - जाति प्रमाण पत्र बनाने की समयसीमा सामान्य प्रशासन विभाग के सर्कुलर में छह माह से घटाकर तीन माह कर दी गई है। यहीं नहीं समाधान केंद्र में आने वाले जाति के आवेदनों का निराकरण तो एक माह में भीतर करके देना होता है। बावजूद इसके यह प्रमाण पत्र तीन माह तो छोड़िए, छह माह तक में भी नहीं बन पा रहे हैं। वतर्मान में जाति प्रमाण पत्र बनने के करीब 300 से अधिक ऐसे हैं, जिन्हें छह माह से अधिक समय बीत चुका है। जबकि तीन माह की लिमिट निकलने वाले आवेदनों की सं या भी इससे कम नहीं है। यह हम नहीं बल्कि प्रशासन स्वयं कह रहा है। प्रशासन की माने तो कलेक्टर कार्यालय स्थिति समाधान केंद्र में प्रतिदिन करीब 50 से 60 जाति प्रमाण पत्र के आवेदन आते हैं। इस तरह एक माह में करीब 1000 से 1100 आवेदन आते हैं,इनमें से कुछ आवेदन निर्धारित समय में निरस्त हो जाते हैं और कुल लंबित रह जाते हैं। हालांकि समाधान केंद्र द्वारा सभी आवेदनों के निराकरण की समयसीमा एक माह तय की जाती है। वतर्मान में भी करीब 2000 आवेदन लंबित पड़े हुए हैं, जिनके बनने की प्रोसेस चल रही है।
नहीं पहुंचता सही सर्किल में - देखने में आ रहा है कि जाति प्रमाण पत्र संबंधी जो भी आवेदन आते हैं वह सही सर्किल में नहीं पहुंच पाते हैं। जिसके चलते वह महीनों पेंडिंग पड़ा रहता है। राजस्व निरीक्षक व पटवारी जब जांच के लिए आवेदन पर ध्यान देता है तब उसे पता चलता है कि यह उसके सर्किल का नहीं है तो आवेदन सीधा तहसीलदार के पास पुन: भिजवा दिया जाता है। इसके बाद फिर से वह दूसरे सर्किल में जाती है। इधर देखने में आया है कि पटवारी-आरआई को भी बहुत काम दे रखे हैं, जिसके चलते मौके पर जाकर पंचनामा बना पाना या जांच पड़ताल कर पाना संभव नहीं है। जांच रिपोर्ट तैयार होने में इसलिए महीना लग रहा है।
- यहां फंसता है पेंच -
- आवेदनकर्ता यदि अजा व अजजा का है और वह सन 1950 का रिकार्ड नहीं लगाता है, तो उसका आवेदन निरस्त हो जाता है।
- आवेदन में ही पूरे दस्तावेज के बारे में जानकारी होती है, इसके बावजूद भी दस्तोवज नहीं लगाए जाते हैं, बाद में दिक्कत पैदा होती है।
- जो मूलत: भोपाल के निवासी नहीं है, वह भी जाति प्रमाण पत्र के लिए आवेदन करते हैं और उन्हें बनाने के लिए दलालों का सहारा लेते हैं।
- 50 साल के रिकार्ड को संभालकर रख पाना भी डेढ़ी खीर है। जिसके पास रिकार्ड नहीं होता उन्हें भटकना पड़ता है।
- राजधानी में धोबी जाति को एससी में रखा गया है, जबकि अन्य जिलों में वह ओबीसी में आते हैं। इसका नियम का फायदा लेने के लिए बहुत सारे लोग जो विभिन्न जिलों में रहते हैं और भोपाल में पढ़ाई या अन्य उद्देश्य के जमे हुए हैं, वह किसी न किसी तरह जाति प्रमाण पत्र बनवाने के लिए जुटे रहते हैं।
-यह है प्रक्रिया -
जाति प्रमाण पत्र बनवाने के लिए सभी दस्तावेजों के साथ आवेदन कलेक्टर कार्यालय में स्थापित समाधान केंद्र या तहसील कार्यालय में जमा किया जा सकता है। समाधान केंद्र में जमा होने वाले आवेदन के लिए 50 रुपए की रसीद कटती है। आवेदन पहले तहसीलदार के पास जाता है। जहां से उसे संबंधित क्षेत्र के आरआई-पटवारी के पास भेजा जाता है, जहां का आवेदन में पता लिखा होता है। आरआई-पटवारी मौका मुआयना व जाति की पुष्टि कर अपनी रिपोर्ट बनाकर तहसीलदार को प्रकरण बनाकर भेजता है और यही प्रकरण तहसीलदार की रिपोर्ट के साथ एसडीएम के पास पहुंचता है। यदि आवेदन के साथ किसी दस्तावेज की कमी होती है तो एसडीएम उसे मंगवाता है, यदि वह दस्तावेज नहीं होते हैं या फिर रिपोर्ट में व्यक्ति के जिले से बाहर के रहने की पुष्टि होती है, तो आवेदन को निरस्त कर दिया जाता है अन्यथा आवेदन को एसडीएम द्वारा स्वीकृत कर जाति प्रमाण पत्र बना दिया जाता है।
इन दस्तावेजों की होती है जरूरत
- आवेदन फार्म का भरा होना व उनमें पीछे लगा हुआ शपथ पत्र का नोटराईज्ड होना।
- आवेदन करने वाले के दो फोटो
- समाज का प्रमाण पत्र
- पिछड़ा वर्ग है तो सन् 1984 का रिकार्ड, अजा व अजजा है तो 1950 का रिकार्ड
- फोटो परिचय पत्र व राशनकार्ड की छायाप्रति या पते संबंधी कोई अन्य दस्तावेज
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नोट - इसके अतिरिक्त उसके पास अन्य कोई दस्तोवज है तो वह भी जमा किए जा सकते हैं। नहीं तो इतने दस्तावेजों के आधार पर भी प्रमाणपत्र बन जाता है।
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-इस नियम का नहीं होता पालन
यदि कोई व्यक्ति जिले से बाहर का है और उसकी पुष्टि हो जाती है, तो आवेदन निरस्त कर दिया जाता है, जबकि होना यह चाहिए कि उस आवेदन को उस जिले को फारवर्ड कर देना चाहिए ताकि वहां से जाति संबंधी जांच पड़ताल हो सके। जैसे ही उसकी पुष्टि होती है, उसके रिकार्ड के आधार पर संबंधित क्षेत्र का जाति प्रमाण पत्र भोपाल जिले से जारी हो जाना चाहिए।
-अपील का भी है प्रावधान
जाति प्रमाण पत्र आवेदन निरस्त हो जाने के बाद अपील का प्रावधान है। इसके बावजूद भी लोग इस नियम का लाभ नहीं उठाते हैं।
-नहीं बनवाते प्रारूप तीन के तहत प्रमाण-पत्र
विभागीय अधिकारियों की माने तो यदि कोई व्यक्ति जो मप्र राज्य की सीमा से बाहर निवास करता है, उसे भी जाति प्रमाण पत्र दिया जा सकता है, लेकिन उसको यह प्रमाण पत्र प्रारूप तीन के तहत। बाहरी राज्यों से आकर भोपाल में निवास करने वाले इस प्रारूप के तहत जाति प्रमाण पत्र नहीं बनवाते हैं, क्योंकि इस प्रारूप के तहत बने प्रमाण पत्र, मप्र की सेवाओं के लिए मान्य नहीं होते हैं। इधर अधिकारी भी ऐसे केसो में प्रारूप तीन के प्रमाण पत्र जारी नहीं करते हैं और आवेदन निरस्त कर देते हैं।
-दलाल करवाते हैं फर्जी काम
सूत्रों की माने तो जिले में जो भी व्यक्ति जाति प्रमाण पत्र आता है वह या तो सीधे समाधान केंद्र में जाता है या फिर दलालों में फेर में अटक जाता है। जो सीधे जाता है उसके आवेदनों की जांच पड़ताल सही तरीके से होती है, जबकि दलालों के माध्यम से पहुंचा आवेदन मूलत: कम ही देखा जाता है। दलाल प्रमाण पत्र गलत तरीके से बनवाने के लिए लोगों से मोटी रकम ऐंठता है। यहीं नहीं इसमें से अधिकतर राशि निचले क्रम के कमर्चारियों से लेकर अधिकारियों तक पहुुंचती है, जिसके चलते फर्जी प्रमाण पत्र जारी हो जाते हैं, जबकि शहर का मूल परिवार इसी प्रमाण पत्र को पाने से इधर-उधर भटकता रहता है।
-नहीं होता सर्कुलर का पालन
जीएडी ने जाति प्रमाण पत्र को लेकर तैयार नए सर्कुलर में 1950 या 1984 के दस्तावेजों को लेकर जो बाध्य न किए जाने की बात कही गई है। उस सर्कुलर में कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति जाति प्रमाण पत्र संबंधी आवेदन में 1950 या 1984 के दस्तावेज नहीं लगा पाते हैं, उसका प्रकरण निरस्त करने के बजाय, समुचित स्थानीय जांच कर पता करनें का प्रयास करें कि वह कहां का निवासी है और यदि पुष्टि होती है कि वह 1950 या 1984 में उसी जिले का निवासी है, जहां पर आवेदन कर रहा है तो उसका जाति प्रमाण पत्र आसपास के लोगों के बयानों से तैयार किए गए पंचनामें के दस्तावेज मानकर बनाया जाना चाहिए।
-कागज जुटाने में आती है परेशानी
वतर्मान में राजधानी में ऐसे बहुत से लोग होंगे, जिनके पास 50 साल का रिकार्ड उपलब्ध नहीं है और उनके द्वारा इतने साल का रिकार्ड संभालकर रख पाना संभव भी नहीं है। कई अधिकारियों का मानना है कि 50 साल तक का रिकार्ड संभालकर रखना मुश्किल काम है। जब जाति प्रमाण पत्र के लिए यह दस्तावेज मांगे जाते हैं तो उनको जुटाना भी मुश्किल ही होता है। छत्तीसगढ़ सरकार ने वतर्मान में कैबिनेट में एक निर्णय पारित कर केवल शपथ पत्र व अन्य दस्तावेजों के आधार पर जाति प्रमाण पत्र बनाने की जो पात्रता प्रदान की है, उसे प्रदेश में भी लागू होना चाहिए।
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