-स्थिति नहीं बदली तो बढ़ेगी शिशु मृत्यु
-अंतर्राष्ट्रीय संस्था यूनिसेफ का खुलासा, खड़ा हुआ बड़ा सवाल
दीपक विश्वकर्मा, भोपाल।
मध्य प्रदेश में समग्र स्वच्छता अभियान पूरी तरह फ्लॉप साबिह हो रहा है। इस बात की तस्दीक प्रदेश के कुछ जिलों में किए गए एक सर्वे और अध्ययन के पश्चात जारी की गई रिपोर्ट से होता है। रिपोर्ट के मुताबिक मप्र उन्नत शौच सुविधाओं के मामले में राष्ट्रीय औसत दर से बेहद पिछड़ा हुआ है। सबसे ज्यादा बुरी स्थिति अनुसूचित जनजातियों की है। जिनकी उन्नत शौच सुविधाओं की दर राष्ट्रीय औसत दर के मुकाबले लगभग एक तिहाई ही है।
अनुसूचित जाति के लोगों में यह आंकड़ा राष्ट्रीय औसत दर के ग्राफ से बेहद नीचे है। शोधकर्ताओं की माने तो आंकड़े सोचने पर मजबूर कर रहे हैं। अगर स्थिति में बदलाव नहीं किया गया तो शिशु मृत्यु में बढ़ोतरी होना लाजमी है। अंतर्राष्ट्रीय संस्था यूनिसेफ ने यह शोध मप्र के करीब एक दर्जन जिलों में किया है। देश में आबादी के 44 प्रतिशत लोग उन्नत शौचालय (टॉयलेट) का उपयोग करते हैं। मप्र में यह रेशो 27.7 फीसदी है। इसी हिसाब से भारत में अनुसूचित जाति के 31.3 और अनुसूचित जनजाति के 19.5 प्रतिशत लोग उन्नत शौचालय का प्रयोग करते हैं। मप्र में यह आंकड़ा सिमट कर क्रमश: 19.0 व 7.5 फीसदी भर है।
-क्यों फ्लॉप
मप्र में स्वच्छता अभियान के अंतर्गत एक से अधिक योजनाओं को शामिल कर घर-घर में शौचलाय निर्माण की कोशिश के चलते यह नकाम सिद्ध हो रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति इसलिए दयनीय है क्योंकि यहां ग्राम पंचायतों और पंचायत सचिवों ने ही काम नहीं किया है। वहीं मॉनिटरिंग करने वाले जिला पंचायत सीईओ ने भी कोई सख्ती नहीं दिखाई। पूरे मप्र में अनुसूचित जाति के घर के मामले में समग्र स्वच्छता का एवरेज 19 प्रतिशत है। वहीं प्रदेश भर में अनुसूचित जनजाति का घरेलू रेशो मात्र 7.5 प्रतिशत है। इस ग्राफ को मप्र सरकार के लिए शर्मनाक बताया है।
-इसलिए बढ़ेगी शिशु मृत्यु दर
जिन जिलों में उन्नत शौच का औसत 3.5 से कम है। वे जिले शिशु स्वास्थ्य के लिहाज से सुखद नहीं कहे जा सकते। इन जिलों में सीधी, अशोकनगर और पन्ना की स्थिति बेहद कमजोर है। खुले में शौच से फैलने वाले किटाणुओं का सीधा असर जच्चा-बच्चा पर पड़ता है। इन जिलों के कुछ गांव तो ऐसे हैं, जहां ग्रामीणों को समग्र स्वच्छता अभियान के बारे में पता ही नहीं है। इस लिहाज से शिशु मृत्यु दर बढऩे इंकार नहीं किया जा सकता। वहीं शिक्षा का स्तर भी इन जिलों के ग्रामीण क्षेत्रों में बेहद कम है।
-यह है पिछड़े जिलों का आंकड़ा
जिला प्रतिशत
पन्ना 2.2
शिवपुरी 2.5
सीधी 1.5
श्योपुर 2.9
अशोकनगर 2.0
डिंडोरी 2.3
(रिपोर्ट में इस ग्राफ को मप्र सरकार के लिए शर्मनाक बताया है)
-जंगल न जाए बहु-बेटी
मर्यादा अभियान के दौरान अधिकारी, समाजसेवी, सामाजिक संगठनों के सदस्य गांव की चौपाल पर पहुंचकर ग्रामीणों को मर्यादा का वास्ता देंगे और उन्हें समझाएंगे कि बहु और बेटी शौच के लिए जंगल जाती हैं तो मर्यादा का उल्लंघन होता है। इसीलिए वे अपने घर में पक्के शौचालय बनवाए, जिससे कि उनके घर की बहु एवं बेटियों को जंगल में न जाना पड़े। यह बात ग्रामीण क्षेत्र के जनप्रतिनिधि घर-घर जाकर ग्रामीणों को समझाएंगे, जिससे कि ग्रामीणों में जागरुकता आएगी।
-क्या है मर्यादा अभियान?
मर्यादा अभियान समग्र स्वच्छता अभियान का दूसरा भाग है। इस अभियान के तहत गांव में शौचालय का निर्माण किया जाना है। जिले में शौचालय विहीन घरों को चिन्हित कर उनमें शौचालय बनाए जाने का कार्य तेजी से हो। इसके अलावा इस अभियान के दौरान लोगों को स्वच्छता के प्रति जागरुक किया जाएगा। इस अभियान में बच्चों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी, इनके माध्यम से सार्थक संदेश दिए जाएंगे।
-वर्जन
मप्र के स्वास्थ्य के आंकड़ों में प्रगति हुई है, लेकिन खुले में शौच की स्थिति दयनीय है। जनगणना के आंकड़ों के हिसाब से यह संतोष जनक नहीं है। प्रदेश सरकार को अपने प्रयासों को मजबूत बनाने की जरूरत है। सबसे हाशिए में आने वाले क्षेत्र में विशेष ध्यान दिया जाना जरूरी है।
डॉ. तानिया गोल्डबर, मप्र फील्ड ऑफिसर, यूनिसेफ
-अंतर्राष्ट्रीय संस्था यूनिसेफ का खुलासा, खड़ा हुआ बड़ा सवाल
दीपक विश्वकर्मा, भोपाल।
मध्य प्रदेश में समग्र स्वच्छता अभियान पूरी तरह फ्लॉप साबिह हो रहा है। इस बात की तस्दीक प्रदेश के कुछ जिलों में किए गए एक सर्वे और अध्ययन के पश्चात जारी की गई रिपोर्ट से होता है। रिपोर्ट के मुताबिक मप्र उन्नत शौच सुविधाओं के मामले में राष्ट्रीय औसत दर से बेहद पिछड़ा हुआ है। सबसे ज्यादा बुरी स्थिति अनुसूचित जनजातियों की है। जिनकी उन्नत शौच सुविधाओं की दर राष्ट्रीय औसत दर के मुकाबले लगभग एक तिहाई ही है।
अनुसूचित जाति के लोगों में यह आंकड़ा राष्ट्रीय औसत दर के ग्राफ से बेहद नीचे है। शोधकर्ताओं की माने तो आंकड़े सोचने पर मजबूर कर रहे हैं। अगर स्थिति में बदलाव नहीं किया गया तो शिशु मृत्यु में बढ़ोतरी होना लाजमी है। अंतर्राष्ट्रीय संस्था यूनिसेफ ने यह शोध मप्र के करीब एक दर्जन जिलों में किया है। देश में आबादी के 44 प्रतिशत लोग उन्नत शौचालय (टॉयलेट) का उपयोग करते हैं। मप्र में यह रेशो 27.7 फीसदी है। इसी हिसाब से भारत में अनुसूचित जाति के 31.3 और अनुसूचित जनजाति के 19.5 प्रतिशत लोग उन्नत शौचालय का प्रयोग करते हैं। मप्र में यह आंकड़ा सिमट कर क्रमश: 19.0 व 7.5 फीसदी भर है।
-क्यों फ्लॉप
मप्र में स्वच्छता अभियान के अंतर्गत एक से अधिक योजनाओं को शामिल कर घर-घर में शौचलाय निर्माण की कोशिश के चलते यह नकाम सिद्ध हो रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति इसलिए दयनीय है क्योंकि यहां ग्राम पंचायतों और पंचायत सचिवों ने ही काम नहीं किया है। वहीं मॉनिटरिंग करने वाले जिला पंचायत सीईओ ने भी कोई सख्ती नहीं दिखाई। पूरे मप्र में अनुसूचित जाति के घर के मामले में समग्र स्वच्छता का एवरेज 19 प्रतिशत है। वहीं प्रदेश भर में अनुसूचित जनजाति का घरेलू रेशो मात्र 7.5 प्रतिशत है। इस ग्राफ को मप्र सरकार के लिए शर्मनाक बताया है।
-इसलिए बढ़ेगी शिशु मृत्यु दर
जिन जिलों में उन्नत शौच का औसत 3.5 से कम है। वे जिले शिशु स्वास्थ्य के लिहाज से सुखद नहीं कहे जा सकते। इन जिलों में सीधी, अशोकनगर और पन्ना की स्थिति बेहद कमजोर है। खुले में शौच से फैलने वाले किटाणुओं का सीधा असर जच्चा-बच्चा पर पड़ता है। इन जिलों के कुछ गांव तो ऐसे हैं, जहां ग्रामीणों को समग्र स्वच्छता अभियान के बारे में पता ही नहीं है। इस लिहाज से शिशु मृत्यु दर बढऩे इंकार नहीं किया जा सकता। वहीं शिक्षा का स्तर भी इन जिलों के ग्रामीण क्षेत्रों में बेहद कम है।
-यह है पिछड़े जिलों का आंकड़ा
जिला प्रतिशत
पन्ना 2.2
शिवपुरी 2.5
सीधी 1.5
श्योपुर 2.9
अशोकनगर 2.0
डिंडोरी 2.3
(रिपोर्ट में इस ग्राफ को मप्र सरकार के लिए शर्मनाक बताया है)
-जंगल न जाए बहु-बेटी
मर्यादा अभियान के दौरान अधिकारी, समाजसेवी, सामाजिक संगठनों के सदस्य गांव की चौपाल पर पहुंचकर ग्रामीणों को मर्यादा का वास्ता देंगे और उन्हें समझाएंगे कि बहु और बेटी शौच के लिए जंगल जाती हैं तो मर्यादा का उल्लंघन होता है। इसीलिए वे अपने घर में पक्के शौचालय बनवाए, जिससे कि उनके घर की बहु एवं बेटियों को जंगल में न जाना पड़े। यह बात ग्रामीण क्षेत्र के जनप्रतिनिधि घर-घर जाकर ग्रामीणों को समझाएंगे, जिससे कि ग्रामीणों में जागरुकता आएगी।
-क्या है मर्यादा अभियान?
मर्यादा अभियान समग्र स्वच्छता अभियान का दूसरा भाग है। इस अभियान के तहत गांव में शौचालय का निर्माण किया जाना है। जिले में शौचालय विहीन घरों को चिन्हित कर उनमें शौचालय बनाए जाने का कार्य तेजी से हो। इसके अलावा इस अभियान के दौरान लोगों को स्वच्छता के प्रति जागरुक किया जाएगा। इस अभियान में बच्चों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी, इनके माध्यम से सार्थक संदेश दिए जाएंगे।
-वर्जन
मप्र के स्वास्थ्य के आंकड़ों में प्रगति हुई है, लेकिन खुले में शौच की स्थिति दयनीय है। जनगणना के आंकड़ों के हिसाब से यह संतोष जनक नहीं है। प्रदेश सरकार को अपने प्रयासों को मजबूत बनाने की जरूरत है। सबसे हाशिए में आने वाले क्षेत्र में विशेष ध्यान दिया जाना जरूरी है।
डॉ. तानिया गोल्डबर, मप्र फील्ड ऑफिसर, यूनिसेफ
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