सोमवार, 7 जनवरी 2013

...और करुणासागर में डूब गई अयोध्या


राम वन गमन के मार्मिक प्रसंग पर बह उठी अश्रुधारा
करोंद में चल रही श्रीराम कथा का सातवां दिन-


तापस वेष विशेष उदासी, चौदह बरस राम वनवासी। जी हां, चक्रवर्ती राजा दशरथ के नयनों से उस समय अनायास ही अश्रुधारा बह निकली, जब श्रीराम की सबसे प्रिय माता कैकेयी ने ही अपने दूसरे वरदान में राजा से राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास मांग लिया। करोंद स्थित रतन कालोनी के विशाल प्रांगण में चल रही श्रीराम कथा के सातवें दिन मानस पुष्प संतश्री ागवान बापू के श्रीमु ा से श्रीराम वनवास का प्रसंग सुनकर हजारों श्रद्धालुओं की अं िायां बरस पड़ीं। अयोध्या का हर रहवासी माता कैकेयी को धिक्कार रहा था, कलंकित बताकर कोस रहा था। उधर संतश्री ने माता कैकेयी के ममत्व का वात्सल्य पूर्ण और बड़े ही मार्मिक शब्दों में वर्णन किया। उन्होंने कहा कि वनवास तो स्वयं ागवान श्रीराम ने मांगा था और बचपन में ही माता कैकेयी से वचन ले लिया था, जिसे नि ााने के लिए कैकेयी ने अपने कलेजे के टुकड़े और पुत्र ारत से ाी अधिक प्रिय श्रीराम को वनवास में ोजा और स्वयं सारे संसार में घृणा और तिरस्कार की पात्र बन गईं। संतश्री ने कहा कि राम वनवास मात्र संयोग नहीं था, बल्कि महाराज दशरथ को श्रवण वध का श्राप था, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें पुत्र बिछोह का दु ा सहना ही था। राम वन गमन के मार्मिक और करुण रस से सराबोर संगीतमय प्रसंग पर समूचा पंडाल ााववि ाोर हो उठा। श्रद्धालुओं ने हाथ उठाकर श्रीराम, लक्ष्मण और जानकी की जयकार की, साथ ही उनकी आं ाों से अविरल अश्रुधारा बहती रही। कथा पंडाल में आयोजन समिति संरक्षक और क्षेत्रीय विधायक विश्वास सारंग, अध्यक्ष देवलाल सैनी, पार्षद ममता तिवारी सहित बद्रीप्रसाद तिवारी, एनके गौतम, विजयसिंह ठाकुर, अवधनारायण विश्वकर्मा, सुमित पचौरी, एड. अशोक शर्मा, महेश केवट, पप्पू ठाकुर, राजू विश्वकर्मा, मुन्नालाल विश्वकर्मा, राजेश शर्मा सहित हजारों महिला-पुरुष श्रद्धालु मौजूद थे।

केवट के प्रिय राम : श्रीराम कथा में केवट संवाद के प्रसंग पर महाराजश्री ने कहा कि जहां करुणा और ाक्ति के साथ निश्चल प्रेम हो, वहां प्र ाु जात-पांत, ऊंच-नीच नहीं दे ाते। क ाी-क ाी ागवान को ाी ाक्तों से काम पड़े, जाना था गंगा पार प्र ाु केवट की नाव चढ़े। संतश्री ने कहा कि केवट ने श्रीराम के चरणों की महिमा सुन र ाी थी कि उनके चरण रज से पत्थर की सिला नारी बन गई। उन्होंने ागवान से कहा कि जब तक आपके चरण न धो लूं तब तक नाव में नहीं चढ़ाऊंगा। अंतत: ागवान को अपने ाक्त की जिद के सामने झुकना पड़ा और जैसे केवट ने उन्हें गंगा पार किया, उसी तरह मेरे प्र ाु ने उसे समय आने पर संसार सागर से पार कर उतार दिया था। उन्होंने कहा हरि व्यापक सर्वत्र समाना, प्रेम से प्रकट होइ मैं जाना। महाराजश्री ने कहा कि प्र ाु तो सर्वव्यापी हैं, किंतु उन्हें पाने के लिए हृदय में केवट की तरह निश्छल प्रेम और निष्कपट ााव होना चाहिए।

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